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प्यारे बच्चों! हम सभी को कहानियां सुनना और पढ़ना बहुत पसंद है। नानी-दादी की कहानियां हों या किताबों में लिखी रंग-बिरंगी कथाएं, ये हमें एक जादुई दुनिया में ले जाती हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि हर कहानी अपने साथ एक अनमोल खजाना लेकर आती है? वह खजाना है—'सीख' यानी 'Moral'।
आज हम लॉटपॉट.कॉम (Lotpot.com) पर आपके लिए एक ऐसी ही पुरानी लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण कहानी लेकर आए हैं। यह कहानी है एक ईमानदार लकड़हारा (Imanadar Lakadhara) की। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे मुसीबत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, हमें सच का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सच्चाई का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन उसका अंत हमेशा सुखद और मीठा होता है।
तो चलिए, बिना देर किए चलते हैं उस घने जंगल में, जहाँ नदी के किनारे हमारा लकड़हारा दोस्त रहता था।
गरीब लकड़हारा और उसका जीवन
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बहुत समय पहले की बात है, भारत के एक छोटे से गाँव में एक लकड़हारा रहता था। उसका नाम रामू था। रामू बहुत ही गरीब था, लेकिन उसका दिल सोने जैसा था। वह अपने छोटे से परिवार का पेट भरने के लिए दिन-रात मेहनत करता था। उसका काम था जंगल से सूखी लकड़ियां काटना और उन्हें पास के बाजार में बेचकर पैसे कमाना।
रामू के पास न तो बड़ा घर था और न ही ढेर सारे पैसे, लेकिन उसके पास एक सबसे बड़ी दौलत थी—उसकी 'ईमानदारी'। पूरा गाँव उसकी सच्चाई की कसमें खाता था। वह कभी किसी को धोखा नहीं देता था और हमेशा मेहनत की कमाई ही घर लाता था।
रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले, रामू अपनी पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी कंधे पर रखता और जंगल की ओर निकल पड़ता। "आज का दिन शुभ हो," वह मन ही मन प्रार्थना करता और अपने काम में जुट जाता। जंगल के पशु-पक्षी भी उसे पहचानने लगे थे क्योंकि वह कभी हरे-भरे पेड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाता था, केवल सूखी डालियां ही काटता था।
नदी किनारे की वो घटना
एक दिन की बात है, गर्मी का मौसम था। सूरज आग बरसा रहा था। रामू लकड़ियाँ काटते-काटते बहुत थक गया था और उसे जोरों की प्यास लगी थी। वह पानी पीने के लिए जंगल के बीच से बहने वाली एक गहरी और पवित्र नदी के किनारे गया। पानी पीने के बाद, उसने देखा कि नदी के ठीक किनारे एक बहुत बड़ा सूखा पेड़ खड़ा है।
रामू ने सोचा, "अगर मैं इस पेड़ की सूखी डालियाँ काट लूँ, तो आज मुझे अच्छे पैसे मिल जाएंगे और मैं अपने बच्चों के लिए मिठाई ले जा सकूंगा।"
यही सोचकर वह पेड़ पर चढ़ गया और अपनी कुल्हाड़ी से लकड़ी काटने लगा। खट! खट! खट! की आवाज़ जंगल में गूंज रही थी। लेकिन तभी अनहोनी हो गई। काम करते-करते रामू की पकड़ ढीली पड़ गई और उसकी लोहे की कुल्हाड़ी हाथ से फिसल गई।
छपाक!
कुल्हाड़ी सीधे नीचे बहती हुई गहरी नदी में जा गिरी। रामू जल्दी से पेड़ से नीचे उतरा और नदी में झांकने लगा। लेकिन नदी का पानी गहरा और तेज था। उसकी कुल्हाड़ी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।
लकड़हारे का दुख और प्रार्थना
रामू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कुल्हाड़ी ही उसकी आजीविका का एकमात्र साधन थी। उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह नई कुल्हाड़ी खरीद सके। उसे अपने परिवार की चिंता सताने लगी।
"अब मैं क्या करूँगा? मेरे बच्चे भूखे रह जाएंगे!" रामू नदी के किनारे बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे और वह भगवान को याद कर रहा था। वह इतना दुखी था कि उसने खाना-पीना भी नहीं खाया।
उसकी सच्ची पुकार और आंसुओं ने नदी की देवी (जल देवता) का ध्यान खींचा। रामू की ईमानदारी और उसकी लाचारी देखकर देवी माँ का दिल पसीज गया। अचानक, नदी के पानी में एक हलचल हुई, तेज रोशनी चमकी और पानी के बीच से एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।
देवी ने मधुर आवाज़ में पूछा, "बेटा, तुम इतना क्यों रो रहे हो? तुम्हारी क्या समस्या है?"
रामू ने हाथ जोड़कर अपनी पूरी व्यथा सुनाई, "हे देवी माँ! मेरी कुल्हाड़ी इस गहरी नदी में गिर गई है। मैं बहुत गरीब हूँ, वही मेरा सब कुछ थी। उसके बिना मेरा परिवार भूखा मर जाएगा।"
ईमानदारी की परीक्षा
देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, "चिंता मत करो बेटा, मैं तुम्हारी मदद करूँगी।"
इतना कहकर देवी नदी के पानी में समा गईं। कुछ ही पल बाद, वे अपने हाथ में एक सोने की कुल्हाड़ी (Golden Axe) लेकर बाहर निकलीं। वह कुल्हाड़ी सूरज की रोशनी में चमक रही थी।
देवी ने पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है, बेटा?"
रामू की आँखें खुली की खुली रह गईं। इतनी कीमती सोने की कुल्हाड़ी! अगर वह चाहता तो झूठ बोल सकता था और अमीर बन सकता था। लेकिन रामू तो ईमानदार लकड़हारा था।
उसने तुरंत सिर हिलाया और कहा, "नहीं माता, यह सोने की कुल्हाड़ी मेरी नहीं है। मैं तो एक गरीब लकड़हारा हूँ, मैं इसे नहीं ले सकता।"
देवी उसकी सच्चाई देखकर बहुत खुश हुईं। वे फिर से पानी के अंदर गईं। इस बार वे एक चांदी की कुल्हाड़ी (Silver Axe) लेकर बाहर आईं। वह भी बहुत सुंदर और कीमती थी।
देवी ने पूछा, "अच्छा, तो क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
रामू ने फिर से विनम्रता से उत्तर दिया, "नहीं देवी माँ, यह चांदी की कुल्हाड़ी भी मेरी नहीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी, पुरानी और साधारण।"
सच्चाई का अद्भुत इनाम
देवी माँ रामू की इस अटूट ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुईं। आज के ज़माने में जब लोग छोटे-छोटे लालच के लिए झूठ बोल देते हैं, रामू ने सोने और चांदी दोनों को ठुकरा दिया था।
देवी तीसरी बार पानी में गईं और इस बार वे रामू की वही पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी (Iron Axe) लेकर आईं।
कुल्हाड़ी देखते ही रामू का चेहरा खिल उठा। वह खुशी से चिल्लाया, "हाँ! हाँ! यही मेरी कुल्हाड़ी है! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद माँ!"
देवी ने नदी के किनारे आकर उसे लोहे की कुल्हाड़ी दे दी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। देवी ने कहा, "रामू, मैं तुम्हारी ईमानदारी से बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने गरीबी में भी अपने उसूलों को नहीं छोड़ा। इसलिए, इनाम के तौर पर मैं तुम्हें यह लोहे की कुल्हाड़ी तो देती ही हूँ, साथ में यह सोने और चांदी की कुल्हाड़ियां भी तुम्हें उपहार में देती हूँ।"
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रामू ने खुशी के आंसुओं के साथ देवी के पैर छुए। वह तीनों कुल्हाड़ियां लेकर अपने घर गया। उस दिन के बाद से रामू और उसके परिवार की गरीबी हमेशा के लिए दूर हो गई, लेकिन रामू ने कभी भी अपना सरल स्वभाव और ईमानदारी नहीं छोड़ी।
लालची पड़ोसी का झूठ (कहानी का दूसरा पहलू)
यह खबर पूरे गाँव में आग की तरह फैल गई कि रामू को नदी की देवी ने सोने और चांदी की कुल्हाड़ियां दी हैं। रामू का एक पड़ोसी था, जिसका नाम 'लालची' (काल्पनिक नाम) था। वह बहुत ही ईर्ष्यालु और लालची स्वभाव का था।
उसने सोचा, "अरे! यह तो अमीर बनने का बहुत आसान तरीका है। मैं भी वही करूँगा जो रामू ने किया।"
अगले दिन, वह लालची पड़ोसी अपनी लोहे की कुल्हाड़ी लेकर उसी नदी के किनारे गया। उसने जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी और जोर-जोर से रोने का नाटक करने लगा।
"हाय! मेरी कुल्हाड़ी! कोई मदद करो!" वह चिल्लाने लगा।
उसकी आवाज़ सुनकर नदी की देवी फिर प्रकट हुईं। उन्होंने पूछा, "क्यों रो रहे हो भाई?"
पड़ोसी ने कहा, "मेरी कुल्हाड़ी पानी में गिर गई है।"
देवी समझ गईं कि यह व्यक्ति नाटक कर रहा है, लेकिन उन्होंने उसकी परीक्षा लेने का फैसला किया। वे पानी में गईं और एक सोने की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं।
देवी ने पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
सोने की चमक देखकर लालची पड़ोसी की आँखें फटी रह गईं। उसने बिना एक पल सोचे झट से कहा, "हाँ! हाँ! यही मेरी कुल्हाड़ी है। लाइए, मुझे दे दीजिए!"
लालच का फल
देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने कहा, "तुम झूठे और मक्कार हो! तुम मेरी परीक्षा में फेल हो गए। तुम्हें न तो यह सोने की कुल्हाड़ी मिलेगी और न ही तुम्हारी अपनी लोहे की कुल्हाड़ी।"
इतना कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं। लालची पड़ोसी वहीं खड़ा रह गया। उसने लालच के चक्कर में अपनी असली कुल्हाड़ी भी खो दी थी। अब उसके पास काम करने के लिए भी कुछ नहीं बचा था। वह सिर पकड़कर रोने लगा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
प्यारे बच्चों, "ईमानदार लकड़हारा" की कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। आइए जानते हैं इससे हमें क्या-क्या सीखने को मिलता है:
सच्चाई की जीत: झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है, जबकि सच हमेशा जीतता है। रामू ने सच बोला और उसे तीन कुल्हाड़ियां मिलीं।
ईमानदारी ही सर्वोत्तम नीति है (Honesty is the Best Policy): चाहे कोई देख रहा हो या नहीं, हमें हमेशा ईमानदार रहना चाहिए। ईमानदारी का इनाम भगवान किसी न किसी रूप में जरूर देते हैं।
लालच बुरी बला है: पड़ोसी ने लालच किया और झूठ बोला, जिसके कारण उसने अपना सब कुछ खो दिया। हमें जो मिला है, उसी में खुश रहना चाहिए।
चरित्र का महत्व: धन-दौलत आनी- जानी है, लेकिन हमारा अच्छा चरित्र और हमारी साख (Reputation) हमेशा हमारे साथ रहती है।
बच्चों के लिए कुछ सवाल (Quiz Time)
रामू की कुल्हाड़ी किस धातु की बनी थी?
नदी की देवी सबसे पहले कौन सी कुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं?
क्या रामू ने सोने की कुल्हाड़ी ली थी?
लालची पड़ोसी के साथ अंत में क्या हुआ?
माता-पिता के लिए संदेश
यह कहानी बच्चों को नैतिक मूल्यों (Moral Values) के बारे में सिखाने का एक शानदार माध्यम है। आप बच्चों से पूछें कि अगर वे रामू की जगह होते तो क्या करते? इससे उनकी सोचने की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता का विकास होगा। लॉटपॉट.कॉम पर ऐसी ही और प्रेरणादायक कहानियां पढ़ते रहें।
विकिपीडिया लिंक (Wikipedia Link)
इस कहानी के मूल स्रोत (ईसप की दंतकथाएं) के बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें:
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Tags : moral story in hindi
लेखक: लॉटपॉट.कॉम संपादकीय टीम
